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साखी (कबीरदास)

ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 1

sakhi kabir meditation

पाठ का परिचय (Introduction):

'साखी' शब्द 'साक्षी' (Witness/Evidence) का तद्भव रूप है। इसका अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान या आँखों देखा सच। कबीरदास जी के दोहों को 'साखी' कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जीवन की जिन सच्चाइयों और रहस्यवाद को अपनी आत्मा से अनुभव किया, उसी को इन दोहों के माध्यम से समाज के सामने रखा। इन साखियों में ईश्वर प्रेम, गुरु की महिमा, अहंकार त्याग, और निंदक (आलोचक) के महत्व का वर्णन किया गया है।

1. कवि परिचय (Poet Introduction)

रचनाकार: कबीरदास (Kabirdas)

कबीरदास जी हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की 'निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा' के सर्वश्रेष्ठ कवि और समाज सुधारक हैं। उनका जन्म 1398 ई. में काशी (वाराणसी) में हुआ था। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपत्ति ने किया। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, ब्रज और पंजाबी के शब्द मिले होते हैं।
रचनाएँ: उनकी वाणियों का संग्रह 'बीजक' कहलाता है, जिसके तीन भाग हैं—साखी, सबद, रमैनी।

2. साखी - सप्रसंग व्याख्या (Explanation of Dohas)

साखी 1: गुरु की महिमा

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय॥

शब्दार्थ (Meanings): गोबिंद (Govind) = ईश्वर/भगवान; काके (Kake) = किसके; पाँय (Paay) = पैर; बलिहारी (Balihari) = न्योछावर/कुर्बान होना; आपनो (Aapno) = आपने।

प्रसंग: इस दोहे में कबीरदास जी ने ईश्वर से भी बड़ा स्थान 'गुरु' को दिया है।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि मेरे सामने गुरु और भगवान (गोबिंद) दोनों एक साथ खड़े हैं। अब मेरे सामने यह दुविधा है कि मैं सबसे पहले किसके चरण स्पर्श करूँ (किसे पहले प्रणाम करूँ)। फिर वे स्वयं ही निर्णय लेते हुए कहते हैं कि हे गुरु! मैं आप पर न्योछावर हूँ (आपके ही चरण पहले स्पर्श करूँगा), क्योंकि यह आपकी ही कृपा है, आपके ज्ञान के कारण ही मुझे ईश्वर के दर्शन हो पाए हैं। अतः रास्ता दिखाने वाला (गुरु), मंज़िल (ईश्वर) से बड़ा होता है।

साखी 2: अहंकार और ईश्वर

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥

शब्दार्थ: मैं (Main) = अहंकार/घमंड (Ego); हरि (Hari) = ईश्वर (God); साँकरी (Saakari) = तंग/पतली (Narrow); तामें (Taame) = उसमें; समाहिं (Samahin) = समा सकते (Can exist)।

प्रसंग: इसमें बताया गया है कि अहंकार (Ego) और ईश्वर की भक्ति कभी एक साथ नहीं रह सकते।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे मन में 'मैं' अर्थात् अहंकार का वास था, तब तक मुझे ईश्वर (हरि) की प्राप्ति नहीं हुई थी। अब जब मेरे ज्ञानरूपी चक्षु खुल गए हैं और मुझे ईश्वर के दर्शन हो गए हैं, तो मेरे मन का सारा अहंकार मिट गया है। प्रेम की गली (ईश्वर की भक्ति का मार्ग) अत्यंत तंग (पतली) है। इस पतले मार्ग में 'अहंकार' और 'ईश्वर' दोनों एक साथ नहीं समा सकते। ईश्वर को पाने के लिए अहंकार का त्याग करना सबसे पहली शर्त है।

साखी 3: पत्थर पूजा पर व्यंग्य

कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

शब्दार्थ: कांकर-पाथर (Kankar-Pathar) = कंकड़-पत्थर; जोरि कै = जोड़कर; ता चढ़ि = उस पर चढ़कर; बांग दे = अजान देना (ज़ोर से पुकारना)।

प्रसंग: इस साखी में कबीर जी ने बाहरी दिखावे और आडंबर पर करारा व्यंग्य किया है।

व्याख्या: कबीर उस समय के धार्मिक पाखंडों और दिखावों पर चोट करते हुए कहते हैं कि लोगों ने बहुत सारे कंकड़ और पत्थरों को जोड़कर एक विशाल मस्जिद तो बना ली है, लेकिन उस पर चढ़कर मुल्ला (मौलवी) बहुत ज़ोर आवाज़ में अजान देकर खुदा (ईश्वर) को पुकारता है। कबीर प्रश्न करते हैं कि क्या तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है जो उसे पुकारने के लिए इतना ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना पड़ता है? ईश्वर तो अंतर्यामी है, वह मन की शांत और सच्ची पुकार भी सुन लेता है। उसे ढोंग या आडंबर की ज़रूरत नहीं है।

साखी 4: पाहन (पत्थर) पूजा पर कटाक्ष

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौ पहार। ताते यह चक्की भली, पीस खाय संसार॥

शब्दार्थ: पाहन (Pahan) = पत्थर; हरि = ईश्वर; पूजौ = पूजूं; पहार = पहाड़; ताते (Taate) = उससे (मंदिर की मूर्ति से); चक्की = चक्की (चक्की से आटा पीसा जाता है)।

प्रसंग: यहाँ कबीर ने मूर्ति पूजा (Idol worship) का विरोध और समाज के अंधे विश्वास पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि यदि एक छोटे से पत्थर (मूर्ति) को पूजने से ईश्वर मिल जाते हैं, तो मैं एक पूरा बड़ा पहाड़ ही पूजने को तैयार हूँ। फिर वे व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि मूर्तियों की उस पत्थर से तो घर में रखी अनाज पीसने वाली पत्थर की चक्की कहीं अधिक भली और उपयोगी है, जिसका पीसा हुआ आटा खाकर पूरा संसार अपना पेट भरता है। कबीर हमेशा से निर्गुण (निराकार) ईश्वर में विश्वास रखते थे।

साखी 5: निंदक की उपयोगिता

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निरमल करे सुभाय॥

शब्दार्थ: निंदक (Nindak) = आलोचना/बुराई करने वाला (Critic); नियरे (Niyare) = पास; राखिए = रखना चाहिए; छवाय = बनवाकर; निरमल = साफ़/पवित्र; सुभाय (Subhay) = स्वभाव (Nature)।

प्रसंग: इस दोहे में कबीर ने एक आलोचक (Critic) को हमारे आत्म-सुधार के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया है।

व्याख्या: कबीरदास जी उपदेश देते हैं कि हमें अपनी बुराई या निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (करीब) रखना चाहिए, हो सके तो अपने आँगन में ही उसकी कुटिया (घर) बनवा देनी चाहिए। क्योंकि निंदक वह व्यक्ति होता है जो बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव की सारी कमियों और मैल को धोकर हमारे चरित्र को निर्मल (स्वच्छ) और पवित्र बना देता है। उसकी आलोचना से हम अपनी गलतियाँ सुधारते हैं और बेहतर इंसान बनते हैं।

3. पाठ के मुख्य उद्देश्य (Themes)

4. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: कबीर ने गुरु को ईश्वर (गोबिंद) से बड़ा क्यों माना है?

उत्तर: कबीर दास जी ने गुरु को ईश्वर से बड़ा और पूजनीय माना है क्योंकि गुरु वह माध्यम है जिसके बिना ईश्वर को जान पाना या उन तक पहुँचना असंभव है। जब हमारे सामने गुरु और ईश्वर दोनों होते हैं, तो सबसे पहला प्रणाम और सम्मान गुरु का हक़ है, क्योंकि गुरु के द्वारा दिए गए सच्चे ज्ञान और मार्गदर्शन के कारण ही भक्त के मन का अज्ञान (अंधकार) दूर होता है और वह ईश्वर (सत्य) के दर्शन कर पाता है।


प्रश्न 2: "प्रेम गली अति साँकरी" पंक्ति का क्या आशय (तात्पर्य) है?

उत्तर: "प्रेम गली" का अर्थ है ईश्वर की भक्ति और प्रेम का मार्ग, और "अति साँकरी" का अर्थ है बहुत तंग या पतली। कबीर का आशय है कि ईश्वर भक्ति का जो रास्ता है, वह अत्यंत सूक्ष्म और पतला है। इस राह पर चलने के लिए मन का निश्छल और पवित्र होना आवश्यक है। जिस इंसान के मन में 'मैं' (अहंकार/घमंड) भरा है, वह इस तंग गली से नहीं गुज़र सकता क्योंकि एक ही संकरी गली में 'ईश्वर' और 'अहंकार' दोनों एक साथ नहीं समा सकते।


प्रश्न 3: कबीर ने निंदक (आलोचक) को पास रखने की सलाह क्यों दी है?

उत्तर: सामान्यतः लोग अपनी बुराई (निंदा) करने वालों से घृणा करते हैं और दूर रहते हैं, लेकिन कबीर कहते हैं कि हमें आलोचक को अपने आँगन में कुटिया बनवाकर सबसे करीब रखना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि निंदक हमारे चरित्र की कमियों और गलतियों को उजागर करता है। जब हम उसके द्वारा बताई गई कमियों को सुनते हैं, तो हम खुद को सुधारने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, निंदक बिना किसी पानी या साबुन के हमारे स्वभाव और चरित्र को निर्मल और स्वच्छ बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।

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